पलायन के दर्द के बीच उम्मीद की मिसाल बना ‘रैबासा होम स्टे’
जब पहाड़ बना पहचान, गांव बना रोजगार... रैबासा की प्रेरक कहानी
कोहरा से ढकी घाटी में, बांज-बुरांश देवदार के जंगल के बीच, एक छोटा सा पत्थर का घर चुपचाप खड़ा है। बदरी खोली और केदार खोली। यह नाम सिर्फ एक घर का नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक ताकत और ग्रामीण आत्मनिर्भरता का जीवंत प्रतीक है। यहाँ सुबह-सुबह आती है पहाड़ की ठंडी हवा, सुकून भरी चुप्पी और एक अजीब सा संदेश – “हम पलायन नहीं कर रहे, हम घर छोड़कर पलायन रोक रहे हैं”।
“रैबासा होमस्टे” के संचालक वरिष्ठ पत्रकार, रंगकर्मी और लेखक त्रिभुवन उनियाल की सबसे बड़ी सफलता यह है कि उन्होंने यहाँ सिर्फ पर्यटकों के लिए जगह नहीं बनाई, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति, आत्मनिर्भरता और ग्रामीण रोजगार का जीवंत मॉडल खड़ा कर दिया है।
यहाँ आने वाले मेहमानों का स्वागत नहीं होता आधुनिक चकाचौंध से, बल्कि पहाड़ की सादगी से होता है। चौमीन, मोमो या फास्ट फूड नहीं, बल्कि गहती की दाल, झंगोरे की खीर, मंडुवे की रोटी, चौसू, धपड़ी, घर का दूध, दही, मक्खन और खेतों में उगी ताजी जैविक सब्जियाँ। लगभग 90 नाली में जैविक खेती चलाते त्रिभुवन उनियाल कहते हैं, “इच्छाशक्ति हो तो गांवों में भी सम्मानजनक रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं।” और आज यह कहानी सच साबित हो चुकी है। रैबासा होमस्टे बनने के बाद क्षेत्र के पाँच से छह युवाओं ने भी अपने-अपने होमस्टे शुरू कर दिए हैं। पलायन रुकने लगा है। यह होमस्टे सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि एक सपना है। सपना कि पहाड़ की संस्कृति, प्रकृति और स्थानीय संसाधनों को रोजगार से जोड़ा जाए तो पलायन की पीड़ा को अवसर में बदला जा सकता है।
रैबासा होमस्टे की सबसे खासियत इसका पारंपरिक पहाड़ी शैली। हर कमरे में आधुनिक सुविधा है, लेकिन बदरी खोली, केदार खोली जैसे नाम इसकी सांस्कृतिक पहचान को और गहरा बना देते हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसे उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ होमस्टे के सम्मान से नवाजा।
पर्यटक कर्नल विश्वबंधु पोखरियाल हर वर्ष यहाँ आते हैं। कहते हैं, “शहर के प्रदूषण और भागदौड़ से दूर बांज, बुरांश और देवदार के जंगलों के बीच घंटों बैठने का जो सुकून मिलता है, उसके सामने सोशल मीडिया की दुनिया भी फीकी लगती है।”
इस होमस्टे का निर्माण किसान और वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. विद्यादत्त शर्मा ने कराया था। डॉ. शर्मा के जीवन पर आधारित डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘मोती बाग’ ऑस्कर पुरस्कार के लिए चयनित हो चुकी है। उन्होंने 1976 में सुखदेई जलाशय का निर्माण कर जल संरक्षण की मिसाल भी पेश की थी।
रैबासा होमस्टे यह साबित कर रहा है कि यदि पहाड़ की संस्कृति, प्रकृति और स्थानीय संसाधनों को रोजगार से जोड़ा जाए, तो पलायन की पीड़ा को अवसर में बदला जा सकता है। यह सिर्फ एक होमस्टे नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर उत्तराखंड का जीवंत मॉडल है।